Thursday, June 27, 2013

चाह : माखनलाल चतुर्वेदी

चाह नहीं मैं सुरबाला के
गहनों में गूँथा जाऊँ,
चाह नहीं प्रेमी-माला में
बिंध प्यारी को ललचाऊँ,
चाह नहीं, सम्राटों के शव
पर, हे हरि, डाला जाऊँ
चाह नहीं, देवों के शिर पर,
चढ़ूँ भाग्य पर इठलाऊँ!
मुझे तोड़ लेना वनमाली!
उस पथ पर देना तुम फेंक,
मातृभूमि पर शीश चढ़ाने
जिस पथ जावें वीर अनेक।


-रचनाकार: माखनलाल चतुर्वेदी

तूफानों की ओर घुमा दो नाविक निज पतवार :शिवमंगल सिंह

तूफानों की ओर घुमा दो नाविक निज पतवार

आज सिन्धु ने विष उगला है
लहरों का यौवन मचला है
आज ह्रदय में और सिन्धु में
साथ उठा है ज्वार

तूफानों की ओर घुमा दो नाविक निज पतवार

लहरों के स्वर में कुछ बोलो
इस अंधड में साहस तोलो
कभी-कभी मिलता जीवन में
तूफानों का प्यार

तूफानों की ओर घुमा दो नाविक निज पतवार

यह असीम, निज सीमा जाने
सागर भी तो यह पहचाने
मिट्टी के पुतले मानव ने
कभी ना मानी हार

तूफानों की ओर घुमा दो नाविक निज पतवार

सागर की अपनी क्षमता है
पर माँझी भी कब थकता है
जब तक साँसों में स्पन्दन है
उसका हाथ नहीं रुकता है
इसके ही बल पर कर डाले
सातों सागर पार

तूफानों की ओर घुमा दो नाविक निज पतवार ।।


रचनाकार: शिवमंगल सिंह 

मैं हूँ उनके साथ खड़ी जो : हरिवंशराय बच्चन

मैं हूँ उनके साथ खड़ी जो
सीधी रखते अपनी रीढ़।

कभी नहीं जो तज सकते हैं
अपना न्यायोचित अधिकार,
कभी नहीं जो सह सकते हैं
शीश नवाकर अत्याचार,
एक अकेले हों या उनके
साथ खड़ी हो भारी भीड़;
मैं हूँ उनके साथ खड़ी जो
सीधी रखते अपनी रीढ़।

निर्भय होकर घोषित करते
जो अपने उद्गार-विचार,
जिनकी जिह्वा पर होता है
उनके अन्तर का अँगार,
नहीं जिन्हें चुप कर सकती है
आतताइयों की शमशीर;
मैं हूँ उनके साथ खड़ी जो
सीधी रखते अपनी रीढ़।

नहीं झुका करते जो दुनिया
से करने को समझौता,
ऊँचे से ऊँचे सपनों को
देते रहते जो न्योता,
दूर देखती जिनकी पैनी
आँख भविष्यत का तम चीर;
मैं हूँ उनके साथ खड़ी जो
सीधी रखते अपनी रीढ़।

जो अपने कंधों से पर्वत
से बढ़ टक्कर लेते हैं,
पथ की बाधाओं को जिनके
पाँव चुनौती देते हैं,
जिनको बाँध नहीं सकती है
लोहे की बेड़ी-जंजीर;
मैं हूँ उनके साथ खड़ी जो
सीधी रखते अपनी रीढ़।

जो चलते हैं अपने छप्पर
के ऊपर लूका धरकर,
हार-जीत का सौदा करते
जो प्राणों की बाजी पर,
कूद उदधि में नहीं उलट कर
जो फिर ताका करते तीर;
मैं हूँ उनके साथ खड़ी जो
सीधी रखते अपनी रीढ़।

जिनको ये अवकाश नहीं है,
देखें कब तारे अनुकूल;
जिनको यह परवाह नहीं है,
कब तक भद्रा कब दिक्शूल,
जिनके हाथों की चाबुक से
चलती है उनकी तक़दीर;
मैं हूँ उनके साथ खड़ी जो
सीधी रखते अपनी रीढ़।

तुम हो कौन, कहो जो मुझसे,
सही-गलत पथ लो तो जान,
सोच-सोचकर, पूछ-पूछकर
बोलो, कब चलता तूफ़ान,
सत्पथ है वह जिस पर अपनी
छाती ताने जाते वीर।
मैं हूँ उनके साथ खड़ी जो
सीधी रखते अपनी रीढ़।


रचनाकार: हरिवंशराय बच्चन